Monday, 25 June 2012

Nawya - रचनाएँ भेजे

प्रमाणित  करता हूँ कि प्रस्तुत रचना स्वलिखित एवम् नितांत मौलिक है
प्रकाशन हेतु
गोप कुमार मिश्र
******श्रमिक की व्यथा********

गैरों के यारो क्या कहने, जब अपनें मुकर गये।
साया भी साथ नही देता, अरसे गुजर गये ।। 
हम श्रमिक बने, जलते ही रहे, सूरज की छाँव तले
अब याद नही, सोए थे कभी, अम्बुवाँ की छाँव तले
जिन राहों पर, चलना सीखा, वो जाने किधर गये
साया भी साथ नही देता***************************१

मीलों- मीलों, टीलों-टीलों, हम नंगे पाँव चले
रिसते छाले, रिसते ही रहे, धरती ने पाँव मले
अपनों में जिए, अपनों के लिए, और अपनें बिछड गये
साया भी साथ नही देता***************************२

अधरों को सिए, आँसू ही पिए, पत्थर मे प्राण भरे
कंकण कंकण, पत्थर पत्थर, शूलो ने त्राण गहे
सपनों मे जिए, सपनों के लिए, और सपनें बिखर गये
साया भी साथ नही देता***************************३
गोप कुमार मिश्र

Tuesday, 19 June 2012


एकलब्य के आंगन में
******************************************
जेठ दुपहरी धूप बरसती अबके बरस इस सावन में।
गुरु द्रोणों की भीड जमा अब एकलब्य के आँगन में।।

तन  की पीडा सह लेता मैं
भूखा प्यासा रह लेता मैं
अगर विकल्प अंगूठा ही है
हंसी-खुशी हाँ कह देता मै
अवसादित या सजग हुआ मन राम दिखे है रावन में।
गुरु द्रोणों की भीड जमा अब एकलब्य के आँगन में।।               १

कुंठित-पीडित मन की पीर
पृथ्वी तन का सीना चीर
सूखी नदिया सा बहता मैं
दिल को कौन बंधाए धीर
छोटे पादप पनपें शायद वट वृक्षों के आँगन में।
गुरु द्रोणों की भीड जमा अब एकलब्य के आँगन में।।              २

आशाओं की डोर न छूटे
विश्वासों की भोर न छूटे
नइया मेरी लहर हवाले
किन्तु नदी का छोर न छूटे
गुरु गरिमा गुणगान रहे श्वासों की आवन-जावन में।
गुरु द्रोणों की भीड जमा अब एकलब्य के आँगन में।।                ३

गोप कुमार मिश्र

Friday, 15 June 2012

******श्रमिक की व्यथा********
गैरों के यारो क्या कहने, जब अपनें मुकर गये।
साया भी साथ नही देता, अरसे गुजर गये ।। 
हम श्रमिक बने, जलते ही रहे, सूरज की छाँव तले
अब याद नही, सोए थे कभी, अम्बुवाँ की छाँव तले
जिन राहों पर, चलना सीखा, वो जाने किधर गये
साया भी साथ नही देता***************************१

मीलों- मीलों, टीलों-टीलों, हम नंगे पाँव चले
रिसते छाले, रिसते ही रहे, धरती ने पाँव मले
अपनों में जिए, अपनों के लिए, और अपनें बिछड गये
साया भी साथ नही देता***************************२

अधरों को सिए, आँसू ही पिए, पत्थर मे प्राण भरे
कंकण कंकण, पत्थर पत्थर, शूलो ने त्राण गहे
सपनों मे जिए, सपनों के लिए, और सपनें बिखर गये
साया भी साथ नही देता***************************३
गोप कुमार मिश्र

Tuesday, 12 June 2012


*******मीत गीत*****
मीत गीत पागलपन मेरा।
सांझ ढले. फिर वहींबसेरा।।

चेहरे पर चेहरा होता है
हंसता चेहरा.दिल रोता है।
पीपल पनघट कहाँ पुराने
लगता है भूतो का डेरा।। **मीत गीत. -----१

भाव उमंगें. हुई तिरोहित
अपनों में भी रहा अपरिचित।
लगता लहरों पर मांझी नें
धुंधला-२ अक्श उकेरा।‌। **मीत गीत. -----२

निपट अकेला. क्यूं डरता है
मोत से पहले क्यूं मरता है
देख अमावस निशापटल पर
किरण लिख रही नया सवेरा।। **मीत गीत. -----३
गोप कुमार मिश्र
 

Sunday, 10 June 2012

**********आइना********

नन्हे २ कदमों चलकर, रात कली इक आयी
अधरो पर मुस्कान खिली ,पर आँखें थी पथरायी।
आलौकिक आभा मे लिपटी, थी स्वर्गलोक से आयी 
पापा कहकर मुझे पुकारा, फिर हौले से मुस्करायी।।
उसे पकडनें को जैसे ही, मैने हाथ बढाया
तुरत छिटककर दूर हो गयी, जैसे कोई छाया।
दिखा अंगूठा बोली पापा, देखी जग की माया
इतना प्यारी फिर भी, कत्ल मेरा करवाया।।
कत्लगाह में मैनें पापा, तुमको बहुत पुकारा
सुना तो होगा पापा तुमनें, पर बंधन नही गँवारा।
देख निठुरता पापा तेरी, मै इतना चकराई
स्वर्णपरी बिटिया मै तेरी, पर आँखे हैं पथराई।।
एक आइना रख वह मुझसे, दूर चली जाती है
देख क्रूरता निज चेहरे की, घेंघी बंध जाती है।
हफ्तों गुजर गये, मैं पूरी रात नही हूँ सोया
सच है भइया, पडे काटनां जिसनें जो भी बोया।‌।
गोप कुमार मिश्र

Friday, 8 June 2012

मन मौन की भाषा
************
प्राणवायु का चैतन्य तत्व मन है
तटस्थ है पर साक्ष्य है
मन में एषणाओ का आना
मन का मनुष्य होना है
एषणा माने इच्छा
इच्छाओ से विचार तथा भावना आती है
हम उसीको मन समझ लेते है
जब कि वह तो मन का बिम्ब मात्र है
अर्थात मनुष्य यदि इच्छा रहित हो जाय
फिर कोई भावना नही यानि निष्काम भाव
कोई विचारनही यानि विचार शून्य
शेष बचता विशुद्ध चैतन्य तत्व मन
अर्थात मन की भाषा मौन

उपरोक्त विचार कबीर एवम् फरीद मिलन प्रसंग से प्रेरित है अतः
श्री चरणों में समर्पित
*******पराठो के पतन के कारण*********
परीक्षा के नाम पर बडे-२ धुरन्धर
मदारी के नाम ज्यूँ नाचते बंदर
इतिहास का अलग ही फलसफा
रात भर याद करो सुबह तक सफा
राम-राम करके परीक्षाहाल मे आ गया
पहला ही प्रश्न मेरे मन को लुभा गया
पूछा गया था बताओ मराठो के पतन के कारण
मैनें जल्दी में पढा पराठों के पतन के कारण
सो हाजिर जवाब की तरह लिख मारा जवाब
बचपन पराठे वाली गली में गुजरा है जनाब
धीमी-2 आँच पर पकते पराठो की महक
लतीफो चुटकुलों से गलियों की रौनक
देशी घी के आसमान छूते भाव
उपर से शुद्धता का अभाव
महगाई की मार पराठों को खा गयी
भीनी-2 गंध उसे भी भा गयी
आज तो रोटी पर भी महगाई की घात हो गयी
पराठे तो इतिहास की बात हो गयी
कोई घटना घटती नही अकारण
शायद यही रहा होगा पराठो के पतन कारण
परीक्षक ने मेरी उत्तर पुस्तिका नोबिल पुरस्कार हेतु भिजवाई
लेकिन हाय रे किस्मत अभी तक चिठ्ठी नही आई।
गोप कुमार मिश्र