Tuesday, 19 June 2012


एकलब्य के आंगन में
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जेठ दुपहरी धूप बरसती अबके बरस इस सावन में।
गुरु द्रोणों की भीड जमा अब एकलब्य के आँगन में।।

तन  की पीडा सह लेता मैं
भूखा प्यासा रह लेता मैं
अगर विकल्प अंगूठा ही है
हंसी-खुशी हाँ कह देता मै
अवसादित या सजग हुआ मन राम दिखे है रावन में।
गुरु द्रोणों की भीड जमा अब एकलब्य के आँगन में।।               १

कुंठित-पीडित मन की पीर
पृथ्वी तन का सीना चीर
सूखी नदिया सा बहता मैं
दिल को कौन बंधाए धीर
छोटे पादप पनपें शायद वट वृक्षों के आँगन में।
गुरु द्रोणों की भीड जमा अब एकलब्य के आँगन में।।              २

आशाओं की डोर न छूटे
विश्वासों की भोर न छूटे
नइया मेरी लहर हवाले
किन्तु नदी का छोर न छूटे
गुरु गरिमा गुणगान रहे श्वासों की आवन-जावन में।
गुरु द्रोणों की भीड जमा अब एकलब्य के आँगन में।।                ३

गोप कुमार मिश्र

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