Sunday, 10 June 2012

**********आइना********

नन्हे २ कदमों चलकर, रात कली इक आयी
अधरो पर मुस्कान खिली ,पर आँखें थी पथरायी।
आलौकिक आभा मे लिपटी, थी स्वर्गलोक से आयी 
पापा कहकर मुझे पुकारा, फिर हौले से मुस्करायी।।
उसे पकडनें को जैसे ही, मैने हाथ बढाया
तुरत छिटककर दूर हो गयी, जैसे कोई छाया।
दिखा अंगूठा बोली पापा, देखी जग की माया
इतना प्यारी फिर भी, कत्ल मेरा करवाया।।
कत्लगाह में मैनें पापा, तुमको बहुत पुकारा
सुना तो होगा पापा तुमनें, पर बंधन नही गँवारा।
देख निठुरता पापा तेरी, मै इतना चकराई
स्वर्णपरी बिटिया मै तेरी, पर आँखे हैं पथराई।।
एक आइना रख वह मुझसे, दूर चली जाती है
देख क्रूरता निज चेहरे की, घेंघी बंध जाती है।
हफ्तों गुजर गये, मैं पूरी रात नही हूँ सोया
सच है भइया, पडे काटनां जिसनें जो भी बोया।‌।
गोप कुमार मिश्र

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