Tuesday, 5 June 2012

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                अभिशाप
रमा बहुत खुश है आज बारहवीं का परिणाम जो निकला है। वरीयता सूची में उसनें तीसरा स्थान प्राप्त किया है। आज उसनें एक आसमान से बात की है। आसमान नें उसके मस्तक को चूमा है और चाँद-तारों ने उसकी बलइयाँ लीं है। वादी झूम उठी है एक कली नें वादी मे अपनी गंध जो बिखेरी है फिजा नें सतरंगी चादर ओढी है। पंक्षियों के कलरव से सम्पूर्ण प्रकृति ओत-प्रोत हो गयी है।
प्रकृति नें कल भी छटांयें बिखेरी थी लेकिन कल मेरा अंतः करण जिग्यासा एवम् कौतूहल से परिपूर्ण था। बाह्य एवम् अन्तः मे कोई सम्वाद नही हो पाया था। किसी नें ठीक ही कहा है कि खुशी अंतर्मन में घटती है। प्रकृति बाह्य रचना है और अंतर्मन उसका रचयिता। यह रचना एवम् रचयिता का मधुर मिलन है।
दुविधा ग्रस्त रमा का मन कभी खुशियों का सागर हो रहा था कहीं सशंकित भी था। कि माता-पिता उसकी खुशियों में भाव-विभोर होगें या शायद नही। इसपर निर्भर करता है कि उसके जुडवाँ भाई का परिणाम ठीक रहा हो। आखिर उसे घर तो जाना ही था। घर पर मातम छाया था क्यो कि भाई परीक्षा में असफल रहा।
उसकी खुशियों को जैसे ग्रहण लग गया। खुशी की बात तो दूर किसी नें परिणाम जाननें की भी कोशिश नही की। रमा ने डरते-डरते माँ से कहा कि माँ मेरा नाम वरीयता--------- आगे के शब्द रमा के गले में ही घुटकर रह गये। माँ का सारा गुबार उसपर ही फट पडा। वह पिटती रही पता नही कब तक। पिताजी नें आकर बचाया परंतु खुशी उनके चेहरे पर भी नही थी।
इस तरह आग को समर्पित रमा का जीवन एक दिन कुन्दन बन कर निखरा। आज वह एक प्रशासनिक अधिकारी है। उसके माता-पिता उसके साथ ही रहते हैं क्यो कि बुरी संगत के कारण भाई जेल की शोभा बढा रहा है। फिर भी भाई माँ-बाप की आँखों का तारा है बुढापे का सहारा है।
वह अक्सर सोंचती है । कि क्या उसका लडकी होना अभिशाप है या अभिशापित समाज की मानसिकता
गोप कुमार मिश्र

1 comment:

  1. बेटी कभी अभिशाप हो ही नहीं सकती .......वह वास्तव में उसका दुर्भाग्य है की उसने ऐसे अभिशप्त मानसिकता वाले समाज में जन्म लिया है ........Son is son till comes his wife...daughter is daughter all the life...!

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